रविवार, 10 मार्च 2024

Romantic Shayari || Break up Shayari || हिन्दी कविता ||

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मौसम था जो फूलो वाला, अफ़सोस कि वो बीत गया
तूने गले लगाया जिसको, शख्स वो मुझसे जीत गया
सोचा था तू समझेगा तो, होगी कोई कमी नहीं
पर वियोग में यह क्या देखा, उन नयनों में नमी नहीं 
सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार

महावीर अशोक बुद्ध कई, नाम गिनो तो आते हैं 
मोती भारत को दिये कई, तिरने पर जब आते हैं
जीवठ हम में जिंदा है, परिवर्तन हम चिंगारी हैं
धीरज शौर्य और साहस का पर्याय हम बिहारी हैं
सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार 

लिखकर प्रेम पत्र जो मैंने,तेरे मन पर छोड़ दिया
ठांव लिखा कागज़ पर तेरा,और पता निज जोड़ दिया
पर खाली पन्ने देना तुम, यदि अनुनय स्वीकार नहीं 
बिन अनुमति के प्रिय तुम्हारे, मेरा कुछ अधिकार नहीं सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार 

हिन्दी कविता Sadanand Kumar

Romantic Shayari for gf




सोमवार, 25 सितंबर 2023

पूस प्रवास भाग 11 | प्रेम कहानी | Romantic love story hindi | Hindi novel

पूस प्रवास भाग 11 | Hindi Kahani | प्रेम कहानी | Romantic love story hindi | Hindi novel |

"आजकल कि आधुनिक युवतियां मैटर डील करने से पहले मैटर को अच्छे से समझने में विश्वास करतीं हैं। एकबार जब मैटर उनके समझ में आ जाए फिर तो "मैटर का मै और टर" अलग-अलग करने में वे देर नहीं लगातीं।" Short hindi story || Hindi Kahani || हिंदी कहानियां || प्रेम कहानी || हिंदी उपन्यास ||


पूस प्रवास भाग 11 

| Hindi Kahani | प्रेम कहानी | Romantic love story hindi | Hindi novel |

वैसे तो चाय हर मौसम में भारतीय लोगों के लिए जीवनदायी पेय है, पर हाड़ कंपा देने वाली ठंडी शाम के सफर में यदि अमृत रूपी चाय मिल जाए तो फिर क्या बात है, पर ऐसी ठंडी परिस्थिति में भी गुची जी को चाय की तलब बिल्कुल न थी। गुची जी ने सामने से प्रस्तावित चाय को मना कर दिया था। ट्रेन से नीचे उतर कर चाय पीते हुए चाचा जी को साफ-साफ समझ आ रहा था कि गूची जी की मनोदशा क्या है क्योंकि हमारे समाज में सामान्य रूप से सुखी मनोदशा वाला व्यक्ति चाय को कभी मना कर ही नहीं सकता और वैसे भी अकेले चाय पीने में वो आनन्द नहीं है जो किसी के साथ चकलल्स करते हुए चाय पीने में है।

इस स्टेशन पर ट्रेन का स्टॉपेज लगभग आधे घंटे का था इसीलिए चाचा जी इत्मीनान से चाय की चुस्कियां ले रहे थे, पर चाय की चुस्कियां में वह गनगनाहट महसूस नहीं हो रही थी सो उन्होंने मन बना लिया कि इस बार वह गुची को जबरदस्ती ट्रेन से उतारकर खींच ले आएंगे।

वो ऐसा सोचकर चाय के स्टाल से पीछे मुड़े ही थे कि उन्होंने ठीक अपने पीछे उस मृगनयनी बाला को खड़ा पाया जो शायद काॅफी की तलब में ट्रेन से उतरी थी। उस बाला को देखकर चाचा जी के चेहरे पर विस्मय आश्चर्य और खुशी के भाव सभी एक साथ झलक गए। क्षण भर के लिए तो उनको यह समझ में ही नहीं आया कि वो बोले तो बोले क्या और करें तो करें क्या, फिर उन्हें लगा कि खुद कुछ बोलने से अच्छा है कि गूची को इसकी सूचना दे सो वो भीड़ को चीरते हुए गूची की तरफ भागे

Hindi Kahani | प्रेम कहानी | Romantic love story hindi | Hindi novel |

उनको ऐसे बदहवासी में भागता देख लड़की ने मन ही मन सोचा कि ये बुढ़ऊ को क्या हुआ, मुझे देखकर ये भागे क्यूं ? 

इधर किसी तरह भीड़ को चीरते हुए चच्चा गूची के सीट बर्थ की खिड़की पर आकर बाहर से ही खिड़की का शीशा पीटने लगे, क्षण भर के लिए गूची को तो कुछ समझ ही नही आया। मन ही मन उसने भी यही सोचा कि अब फिर से इस बुढ़ऊ को क्या हुआ, ठंड के कारण ट्रेन की सभी खिड़कियों के शीशे बंद थे, हड़बड़ाहट में जैसे तैसे गूची ने खिड़की का शीशा ऊपर उठाया,

शीशा उठाते ही चच्चा जी लगभग चिल्ला उठे, " वो लड़की वहां चाय के स्टाल पर खड़ी है, जल्दी चलो !! "

गूची जी तो यह सुनकर शंट हो गए, खिड़की के जगंलो में खोपड़ी सटाकर कन्खियों से ही देखने लगे कि पहले खुद देखकर आश्वस्त हो लें, इतने में चच्चा जी फिर चिल्लाएं, "अबे! चलों जल्दी !! " 

गूची जी "हां हां " करते हुए मुंडी हिलाते हुए दौड़े।

आनन फानन में दौड़ते हुए दोनों चाय के स्टाल पर पहुंचे। स्टाल पर पहुंचते ही गूची जी ने देखा कि सच में वह लड़की तो यहीं है। उस लड़की को देखकर गूची जी के मन में एक सुखद भाव उतर आया, यह खुशी उनको अपना सूटकेस मिलने की उम्मीद में महसूस नहीं हो रही थी बल्कि यह खुशी बस इसलिए थी कि फिर से यह मृगनयनी सुंदरी उनके आंखों के सामने थी। गूची जी तो खड़े खड़े मानों कोई स्वप्न देख रहे हो। हाय! यह खुबसूरत बाला नरम ऊनी पिंक स्वेटर में लिपटी हुई गरम काॅफी पीती हुई कित्ती क्यूट लग रही है, गूची जी तो खड़े खड़े ना जाने किस स्वप्न लोक की सैर कर रहे थे, इस क्षण तो उनको अपना सूटकेस याद भी नहीं। लड़की को गर्म काॅफी पीता हुआ देखकर गूची जी को भी मानों हीटर की हल्की-हल्की गरमाहट फील हो रही थी।

गूची जी अभी इस सुखद परिदृश्य को महसूस कर ही रहें थे कि बगल में खड़े चच्चा चिल्ला पड़े " ऐ लड़की !! इस लड़के का सूटकेस कहां है। "

चच्चा जी की इस कर्कश आवाज़ ने गूची जी के सुखद स्वपन्न के चिथड़े फाड़ डाले, हड़बड़ाहट में गूची जी हां, ना, हां, ना, के द्वदं में फंसे कुछ बोल पाने की स्थिति में थे नहीं।

इधर चच्चा जी ने दुबारा चीत्कार मचाई " ऐ लड़की!! बोलती क्यूं नहीं इस लड़के का सूटकेस कहां है?"

अभी तक तो इत्मीनान से अपने काॅफी पर फोकस करती हुई लड़की को समझ में ही नहीं आया कि ये सब हो क्या रहा है। 

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वैसे आधुनिक युग की युवतियों को ईश्वर ने एक बहुत ही बेस्ट टैलेंट से नवाजा है। आजकल कि आधुनिक युवतियां मैटर डील करने से पहले मैटर को अच्छे से समझने में विश्वास करतीं हैं। एकबार जब मैटर उनके समझ में आ जाए फिर तो "मैटर का मै और टर" अलग-अलग करने में वे देर नहीं लगातीं।

चचा जी के लगातार मै मै टर टर करने से वहां भीड़ इकट्ठा होने लगी थी, इधर अब लड़की को भी यह समझ आ गया था कि ये दोनों अपने सूटकेस के लिए परेशान हैं पर मूल बात उसे यह नहीं समझ आ रही थी कि उसके सूटकेस से मेरा क्या लेना-देना है, ये लोग मुझसे क्यूं अपना सूटकेस मांग रहे हैं। मन में यहीं सब उधेड़बुन लिए लड़की पहले तो सहमी हुई चुपचाप खड़ी रही।

लड़की को चुपचाप खड़ा देख चच्चा थोड़ा और चिड़चिड़ा गए। फिर से एक उत्तेजित और कर्कश आवाज़ में चिचिया उठे कि "ऐ लड़की !! बताती है कि नहीं कि सूटकेस कहां है?"

आसपास इकठ्ठी भीड़ के संदेहास्पद नजरें और इस तमाशे से  लड़की के सब्र का बांध भी टूट गया।

लड़की ने भी लगभग चिल्लाते हुए कहा, "इसका सूटकेस मैं क्या जानूं क्या हुआ।" 

यह सुनते ही चच्चा जी के भेजे में मानों एक ज्वालामुखी फूट गया, वे फिर से चिल्लाएं " झूठ बोलती है लड़की, सबने देखा कि कैसे तुमने इस लड़के को दालमूट खिला कर लुढ़काया और फिर इसका सूटकेस लेकर चलती बनीं।"

ये सब सुनकर तो उस कोमल काया का मानों खून ही खौल उठा, पूरे रोष में लाल डबडबाई आंखें लिए वो चिल्लाई कि  "क्या बकता है बुढ़ऊ!! मैं क्या तुझे चोर उचक्की लग रही हूं" 

इतना बोलते बोलते वो गूची की तरफ पलटी और बोली " मैंने कब तुम्हारा सूटकेस उठाया, जो तुम यह सब तमाशा करवा रहे हो।" 

गूची जी ने इतने करीब से उस लड़की की लाल गुस्साई आंखें और उनमें भरें आंसू देखे कि बस देखते ही रह गए, गूची जी मानों सुन्न हो गए, कान खुले थे पर वो लड़की उन्हेें क्या गालियां दे रही है ये सब सूनने में गूची जी के कान असमर्थ थे।

आसपास इकठ्ठी भीड़ तो ऐसे चटकारे ले रही थी मानो खड़े खड़े काला खट्टा गोला चूसने का आनन्द आ रहा हो।

प्लेटफार्म पर ऐसा बिना बात का बवाल होता देख रेलवे पुलिस के कान खड़े हो जाना स्वभाविक था, पुलिस वाले आए और फिर से गालियां देकर भीड़ को भगाया। पुलिस ने सारा मामला सुनने के बाद गूची से कहा " तुम्हरा सूटकेस कहां गायब हुआ है।" 

गूची जी घिघियाते हुए बोले " जी सीट बर्थ के नीचे रखा था पर अब मिल नहीं रहा।" 

"चलों देखते हैं" इतना कहकर पुलिस वाले गूची, चच्चा और लड़की को लेकर वापस गूची के सीट पर आई।

सीट पर आते ही पुलिस ने तफ्तीश शुरू की और हड़काऊ स्वर  में बोला "बताओं कहां रखा था सूटकेस !!" 

गूची जी अपने सीट के नीचे बैठकर बोले "देखिए यहीं रखा था पर अब यहां नहीं है।"

पुलिस वाले ने भी बैठकर सीट के नीचे देखा और बोला " ये बोरी किसकी है। "

गूची जी ने कहा " मुझे पता नहीं सर मैंने तो यहां अपना सूटकेस रखा था पर जब मेरी आंख खुली तो मैंने देखा कि यहां मेरा सूटकेस नहीं था उसके जगह पर ये बोरी रखी हुई थी। "

इतना सुनने के बाद पुलिस वाले चच्चा जी से मुखातिब हुए "आपने ये बोरी रखते हुए किसी को देखा नहीं। "

चचा जी ने अब शांतचित्त स्वर में कहा "सर हमने तो ध्यान नहीं दिया। "

अब पुलिस वाले ने लड़की से कहा " क्या आपने किसी को यहां बोरी रखते हुए देखा? "

इसपर लड़की ने कहा कि " नहीं !! जबतक मैं यहां बैठी हुई थी तब तक तो कोई नहीं आया था बोरी लेकर। "

इसपर पुलिस वाले ने लंबी सांस ली और सांस छोड़ते ही चिल्लाया " अबे !! ये बोरी किस गद्हे ने यहां ठूंस रखी है।.... जल्दी बोल नहीं तो अभी निकाल कर फेंक दूंगा इसको ट्रेन से बाहर। "

इतना सूनते ही दो तीन सीट बाद से एक गरीब मज़दूर महिला निकल कर आई और कहा "क्या हुआ साहब ये बोरी मेरी ही है।"

पुलिस वाले ने चेहरे की भाव भंगिमा और तीक्ष्ण करते हुए कहा " क्या है इसमें? "

गरीब मज़दूर महिला बेचारी डरते डरते बोली " सब्जियां है साहब इनमें। बस दो स्टेशन बाद उतार लूंगी। "

पुलिस वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी, वे जानते थे कि ये किसान लोग है और इनका रोज़ का आना जाना है पर मूल मुद्दे की बात तो यह थी कि सूटकेस कहां है, इसीलिए पुलिस वाला फिर बिफर पड़ा 

" इस लड़के का सूटकेस कहां है, तुमने इसका सूटकेस हटा कर यहां अपनी बोरी ठूंस दी, इसका सूटकेस क्या किया।"

इतना सूनकर तो बेचारी गरीब मजदूर महिला हड़बड़ा कर बोली " मैंने कोई सूटकेस नहीं हटाया इनका सामान यहीं होगा।" 

इतना कहकर वो झुककर अपनी बोरी हटाने लगी जैसे ही बोरी हटी, बोरी के पीछे से गूची का सूटकेस प्रकट हो गया। 

गरीब मजदूर महिला सूटकेस बाहर खींचती हुई बोली " यही सूटकेस है क्या? "

सूटकेस देखते ही गूची और वो मृगनयनी लड़की दोनों एकसाथ चिल्लाएं। 

गूची ने कहा कि " सूटकेस यहीं है मेरा"

और लड़की ने चिल्लाकर कहा " देखा सूटकेस यहीं है !! " और इतना कहकर लड़की ने ऐसा आपा खोया कि पुलिस वाले भी पलभर के लिए कोने में हो गए और लड़की का तांडव देखने लगे।

मन भर मनहरण गालियां देने के बाद उस लड़की ने गूची का सूटकेस उठाकर चच्चा की छाती पर ही दे मारा। 

चच्चा जी तो छाती पकड़ कर वहीं बैठ गए। गूची जी ने भी तुरंत अपना सूटकेस पकड़ लिया ताकि फिर से ये सूटकेस कहीं उनके माथे पर बम बनकर ना गिर पड़े।

Short hindi story || Romantic love story Hindi || Hindi novel || प्रेम कहानी ||

यह सब तांडव देखने के बाद आसपास के सभी यात्री सकपका गए। वो मजदूर महिला ने भी यही सोचकर अपनी बोरी हटा ली कि कहीं उसकी बोरी को भी फुटबॉल ना बना दिया जाए।

मामला उग्र होता देख पुलिस वालों ने किसी तरह समझा बूझा कर लड़की को शांत किया और वापस उसे अपने सीट पर ले गए, पर हां जाते जाते गूची को यह नसीहत जरूर देते गए कि किसी भी बात का बतंगड़ बनाने से पहले उसे अपनी सीट के नीचे ठीक से देख लेना चाहिए था।

क्रमशः,,

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रविवार, 17 सितंबर 2023

हर बार पूछती हो "कैसे हो" || Hindi love letters || Hindi love story || Hindi Kahani ||

|| Hindi love letters || Hindi love stories ||हर बार पूछती हो "कैसे हो" 

Classic love story || Romantic love story ||

हर बार पूछती हो "कैसे हो" 

बम्बई

13 मई 1983

” स्वरा ”

पिछले मंगल को चिट्ठी मिली थी तुम्हारी पर जवाब अब दे रहा हूं लिहाजा मेरा जवाबी खत़ भी तुम्हे देर से ही मिलेगा,

देर होता देख, तुम्हारा संतोषी मन तुम्हे ये ढ़ाढ़स बंधाने लगेगा की शायद काम धंधे मे काफी व्यस्त होगा, पर ऐसा नही है,

मेरे पास व्यस्तता के नाम पर फिलहाल इतना ही है की सवेरे सारी डिग्रीयो को समेट कर मैं हर दफ्तर मे याचक की भांति अपने काबिल होने का प्रूफ और नौकर बनने की अर्जी जमा कराता फिरता हूं,

तुम्हे देर से जवाब देने का कारण कुछ और भी है, तुम्हे पता है की तुमसे हर बार हर बात मै बिना किसी पूर्वाग्रह के कह देता हूं, और इसकी आजादी भी तुमने ही मुझे दी है, तुम अपने उम्र और परिवेश से ज्यादा परिपक्व जो ठहरी ,

युवतियो के लिए दमघोंटू अभिशप्त समाज मे चिट्ठी लिख कर पोस्ट करने मे जितनी मशक्कत तुमको करनी पड़ती होगी, मन के अंर्तद्वंद के कारण उतनी ही मशक्कत मेरे हिस्से भी है ,

तुम्हे जवाबी खत़ लिखने मे मुझे भी कई अंर्तद्वंद से पीछा छुड़ाना पड़ता है,

हर बार पूछती हो ” कैसे हो ”

तुम्हारे किसी सवाल के जवाब मे मुझसे झूठ बोला नही जाता,

और सच बोल कर मै खुद को कमजोर पेश नही करना चाहता

तुम जो कहती थी मुझे की “बहुत जूझारू हो तुम” मेरे लिए वो एक कमाई हुई दौलत है

बहुत एहतियात से तुमको जवाबी खत़ लिखता हूं की खत़ का भाव क्या रखूं की तुम वैसी ही मेरे जूझारूपन पर नाज़ करती रहो बस यही मन बनाते हुए जवाबी खत़ लिखने मे देर हो जाती है

जितना तुमको जान गया हूं उस हिसाब से मुझे मालूम है की तुम चिढ़ कर यही कहोगी की इतनी दिक्कत है तो मत दो जवाब ,, मै भी खत़ नही लिखती ,,

पर सूनो खत़ लिखना बंद मत कर देना , मेरे पास यहां बेहिसाब अकेलापन है, शहर की हर सुबह ये एहसास दे कर उठाती है की तुम दूर हो मुझसे,

दोपहर भी ऐसी ही कट जाती है , शहर की भीड़ भी बियांबान सी होती है , एक सूकून बस इतना है की रात को मेरे कमरे की खिड़कियो से चांदनी रौशनी आती है और लेटे लेटे आसमान और तारे साफ दिखते है,

लेटे हुए मै अपने कल का सारा रूटीन सोच लेता हूं , और तुम्हारा आज का दिन कैसा बीता होगा ये कल्पना भी सजीव हो उठती है ,

मन वही छोड़ कर आ गया हूं मै तुम्हारे पास , अपने गली अपने गावं मे, एक तुम्हारे लफ्ज ही है जो सांसे देते है हर बार जब भी पढ़ता हूं इनको , दूरूस्त रहूं इसलिए खत़ देती रहना,

अंत में तुम्हारे सवाल का जवाब – मैं ठीक हूं , हिम्मत नहीं हारी है , अभी जीत बाकी है, तुमको जीत लेना अभी बाकी है |

कुशल रहो हमेशा

” मलय ”

क्रमशः,,,

सदानन्द कुमार 

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पूस प्रवास भाग 07 और 08 || Hindi Kahani || Hindi Story || H

नमस्कार दोस्तों,  Hindi Kahani || Hindi Story || पूस प्रवास भाग 07 और 08 में आपका स्वागत है।

" पूस प्रवास " भाग-07
( सफरनामा )
बुजुर्ग की कही एक एक बात गूची जी की चेतना को लगभग मूर्छित किए जा रही थी। गूची को इतनी देर में ऐसा एकतरफा यकीन तो हो ही गया था कि इस सफर के खत्म होते होते वो कम से कम उस लड़की से समान्य मित्रता और उसके फेसबुक और इंस्टाग्राम के फ्रेंड लिस्ट में अपनी जगह तो बना ही लेगा पर वो लड़की बिना किसी विदा संदेश के ऐसे चुपचाप उतर कर अपने गंतव्य को चली जाएगी ऐसा गूची को बिल्कुल आभास नहीं था । गूची को इस वक्त अपने आप पर इतनी कोफ्त हो रही थी कि उस मृगनयनी के जाते वक्त उसकी आंख क्यू ना खुली, संताप के मारे गूची तो खुद को आजीवन कुंवारेपन का श्राप देते देते रह गया, लेकिन खैर, गूची जी ने खुद को कोसते हुए अपना मन कड़ा कर लेना ही उचित समझा और किसी हारे हुए योद्धा की तरह सीट पर धप्प से बैठ पड़े। विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि उसके तरफ से इतने आत्मीयता के बावजूद उस लड़की ने उसे एक अजनबी से बढकर कुछ ना समझा । अचानक गूची को याद आया कि लड़की तो कह रही थी कि कन्फर्म सीट के लिए टीटी से बात कर कुछ ऐरेंजमेंट कर लूंगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि टीटी ने उसे कन्फर्म सीट दे दी हो और वो उस सीट पर शिफ्ट कर गई हो, ऐसा सोचते ही गूची जी के दिल में उम्मीद की एक डिभरी जल पड़ी । गूची जी सोचने लगे अभी पूरे ट्रेन में खोज मारता हूं मिल जाए तो बस सामान्य शिष्टाचार के साथ आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं देकर वापस अपनी सीट पर चला आऊंगा और कम से कम ये जरूर बता दूंगा कि ऐसे बिना विदा कहे चले आने से मन अधर में रह जाता है और अगर लड़की ने सहज भाव से बात की तो कम से कम अपनी इंस्टा आई डी जरूर बताता आऊंगा, किसी ने सच ही कहा है कि पुरूषों का दिल जब घास चरने लगे तो महिला के नजर में वह बस गद्हा बन कर ही रह जाता है 🥴 पर गूची जी मन ही मन ना जाने कितने मोतीचूर के लड्डू फोड़ चुके थे, और बड़े उत्साहित होकर अपने सीट से खड़े हुए कि अब तो पूरी ट्रेन को छान मारना है । जैसे ही सीट के नीचे अपने जूते निकालने के लिए गूची जी झुके तो सीट के नीचे उन्हें एक भारी सी बोरी देखकर कुछ अटपटा सा लगा फिर अचानक उन्हें याद आया कि ससुरा हमने तो यहां अपना ट्राली सूटकेस रखा था, बोरी देखकर सहसा गूची के अंतर्रात्मा से आवाज आई कि " हाय दद्दा !! हमारा सूटकेस कहां है । " 
क्रमशः ,,,

पूस प्रवास भाग 08 || Hindi Kahani || Hindi Story || 

" पूस प्रवास " भाग- 08 
( सफरनामा )
अपने सूटकेस को निर्धारित जगह ना देखकर गूची जी की तो हवाइयां उड़ने लग गई, आनन फानन में आस पास कि सीट के नीचे किसी मूषक की भांति दंडवत लंबवत होकर देख डाला पर सूटकेस मिला नहीं । चेहरे पर भंयकर आशंकित भाव लिए गूची जी बुजुर्ग दंपति के तरफ पलटें और बड़ी व्याकुलता के साथ अपने सूटकेस की खोज लेनी चाही, " आपने मेरा सूटकेस देखा क्या, यहीं तो रखा था, अभी दिख नहीं रहा । "
बुजुर्ग ने गूची कि इस बात पर कोई विशेष उत्तेजना नहीं दिखाई और बड़े इत्मीनान से बोले-" लो !! गया सूटकेस !! और खाओ बेटा दालमूट, तभी मैं सोचूं कि लड़की तुम्हारे आंख लगते ही क्यूं घसक रहीं हैं ? " 
इस वक़्त गूची जी के दिलो-दिमाग में बस अपना सूटकेस घूम रहा था, बुजुर्ग के द्वारा कसा गया तंज उसे छू तक ना पाया, गूची जी अब बड़े दयनीय भाव भंगिमा के साथ बोले- " क्या आपने उस लड़की को मेरा सूटकेश ले जाते हुए देखा ? "
बुजुर्ग ने अब अपनी आवाज़ में थोड़ी तल्खी लाते हुए कहा- " अब सूटकेस तो उसके पास कई थे, कौन जाने कि वो तुम्हारा ही सूटकेस था । " गूची जी को अब आगे पीछे कुछ नहीं सूझ रहा था । कहां वो अभी चलते ट्रेन में किसी भ्रमर की भांति कली की तलाश में निकलने वाले थे और कहां अभी खुद अपना ही टीन टप्पर उजड़ गया है । घड़ी घड़ी गूची जी को उस बैग में ढूंसे हुए अपने सामान की याद आ रही थी । उस मृगनयनी के सम्मोहन में दिमाग अब इतना भोत्थर हो गया था कि ठीक से याद भी नहीं आ पा रहा था कि सूटकेस में क्या क्या जरूरी चीजें रखी थी । गूची जी को सूटकेस विहीन होने पर ऐसा सदमा लगा कि बार बार कानों में " तेरे नाम " फिल्म का मशहूर गाना गूंजता हुआ मालूम होता था " क्यूं , किसी को वफ़ा के बदले वफ़ा नहीं मिलती, 🎶🎵 क्यू, किसी को ख़ुशी के बदले ख़ुशी नहीं मिलती 🎶 ये प्यार में क्यू होता है,, ये प्यार में क्यू होता है,,
क्रमशः,,
सदानन्द कुमार

अगला भाग

गुरुवार, 14 सितंबर 2023

हिन्दी दिवस पर कविता || हिन्दी दिवस पर शायरी || " हिन्दी माई "

हिन्दी दिवस पर कविता || हिन्दी दिवस पर शायरी || 

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हिन्दी को समर्पित इस पेज पर। हिन्दी दिवस के मौके पर मेरी एक कविता,

ज्ञानार्जन का साहस देकर 

मुस्काती दिखती मां हिंदी 

पढ़ लिखकर नूतन रचने का 

ऐसा यश देती मां हिंदी 


यहां अनेकों भाषा बोली 

एक सूत्र यह बांधे बोली 

जब शब्दों ने आंखें खोली 

काव्य सजे मानो रंगोली 


भाषा दूजी समझ ना आयी

तुमरे पास सहजता पायी

बहुत धनी है अपनी माई

बोलो हिंदी मेरे भाई

सदानन्द कुमार

समस्तीपुर बिहार

हिन्दी दिवस पर कविता || हिन्दी दिवस पर शायरी || सदानन्द कुमार समस्तीपुर बिहार


बुधवार, 17 मई 2023

Hindi Shayari || Poets from Samastipur

Hindi Shayari || Poets from Samastipur

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आप भी यदि समस्तीपुर और आसपास के लोगों को अपनी शायरी या कविता सुनाना चाहते हैं तो हमें इस नंबर पर व्हाट्स ऐप करें।

9534730777

लिखी अपनी कहानी में तुझे मैंने बताया है

जहां ऐसी जरूरत थी वहां तुझको छिपाया है

रहे तेरी खुमारी में दिया उसका किराया है

लिखा जो कुछ कभी मैंने सुनो वो भी बकाया है


सदानन्द कुमार 

समस्तीपुर बिहार

सभीपुर के कवि सदानंद कुमार









साथ छूटा मैं तमाशा बन गया

ख्वाब टूटा मैं फसाना बन गया

सोचता था मैं अनाड़ी हूं अभी

यार उसका मैं ठिकाना बन गया 


मुहब्बत में दिवानो ने यहां सब कुछ लुटाया है 

असासा बेचकर अपना गिफट उसको दिलाया है

जमाना भूल जाएगा सितम ये की यहां तूने

पुरानी आशिकी के नाम का टैटू छुपाया है

सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार


प्रेम करके हमी से छिपाती रही
गीत मेरे हमेशा सजाती रही
हार कर प्रेम में ना कबूला कभी
हार को जीत नित ही बताती रही

हाथ लाली लगाकर दिखाती रही
‍नाम मेरा हिना से बनाती रही
रंग दो ही सुने थे अभी और वो
ओढ़नी पे कई रंग लाती रही
किधर जाएंगे
तुमको लगता है कि सुधर जाएंगे
सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार

शनिवार, 6 मई 2023

पूस प्रवास भाग 09 और 10 || Short Stories in Hindi || Hindi Kahani || Desi Kahani

Welcome to Short Stories in Hindi || Hindi Kahani blog.

पूस प्रवास भाग 09

सफरनामा

बीच सफर में अपने चोरी हो चुके सूटकेस से गूची जी का मन अब इतना विचलित हो चुका था कि अब गूची जी को समूचा संसार ही 420 बुझा रहा था, पर कहीं ना कहीं उनका मासूम दिल ये भी मानने को तैयार नहीं हो रहा था कि इतनी शांतचित्त मृगनयनी सुंदरी उसका सूटकेस उठाने जैसा तुच्छ काम करेगी, बात विचार और आभामंडल से तो वो किसी प्रेमनगर की प्रिसेंस लग रही थी।

अब प्रिंसेस सरीखी लड़कियां अगर ट्रेन के स्लीपर क्लास में नीरीह जनता के सूटकेस टपाने लगे तो ये बेचारे चोर उचक्के और जगत में विचरन कर रहे लफंडरों के सामने तो रोजगार की विकट समस्या उत्पन्न हो जाएगी ।

ऐसे ही कई ऊटपटांग विचारों में मुग्ध गूची जी ऐसे सुन्न से बैठे मालूम पड़ रहे थे मानों अपनी अंतरात्मा से अपने सूटकेस के मुक्ति का मार्ग पूछ रहे हों । गूची जी को इतने गंभीर चिंतन में गुम देख सहयात्रियों को ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो गयी कि गूची जी को सूटकेस का बहुत गंभीर सदमा लगा है । सामने बैठे बुजुर्ग दंपति में से चाचा जी को तो गूची जी पर तनिक भी दया नहीं आई पर गूची जी को ऐसे मौन बैठे देख चाची के दिल में थोड़ी करूणा आई और ममत्व वश वह पूछ बैठी कि बेटा सूटकेस में कोई बहुत जरूरी चीजें थी क्या ? इससे पहले कि गूची जी हां या नहीं कहते चाचा जी बोल पड़े - " अरे ! अगर जरूरी चीजें नहीं होती तो ये अपने छाती पर लादकर उस सूटकेस को क्यूं लाता ? " यह सुनकर गूची जी ने निरूत्तर रहना ही ठीक समझा पर यह सवाल सुनकर गूची जी के मन में एक बात कौंधी कि सूटकेस में तो ऐसे कई जरूरी सामान थे पर एक दो फटेहाल बनियान और छेद युक्त कच्छे भी तो थे, भले ही उस सुंदरी ने चोरी के इरादे से सूटकेस उठाया था पर सूटकेस खोलते ही वो मेरे फटेहाली से अवगत हो जाएगी । ये सोचकर गूची जी के आंखों के सामने और भी अंधेरा छाने लगा। 

यूं तो संसार में यह बात व्याप्त है कि पुरुष का मन बड़ा ही कठोर होता है पर बात अगर किसी नवयौवना की हो तो गूची जी जैसे पुरुष बड़े उदार मन से उसके लिए अपना सूटकेस तो क्या अपनी जमीन जायदाद भी लूटा देते, ऐसे पुरुष नवयुवती के लिए हमेशा क्षमाशील बने रहते हैं, चाहें नवयुवतियां उनकी लंका ही क्यूं ना लगा दें पर इतने उदार हृदय से क्षमाशील बने रहने का कभी कभी कोई फायदा नहीं क्योंकि नए कल्चर के लोग इसे ठरकपन के रूप में परिभाषित कर देते हैं, खैर,, जो भी हो,,

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" पूस प्रवास भाग 10 "

वैसे तो सफ़र में लूट जाने का एहसास इतना भारी है कि इस पर कई तरह के मारक और दिल का दर्द बयां करते हुए कई तरह के शेरों शायरी व नगमें लिखें जा सकतें है पर चूंकि अपने गूची जी के लिए यह जीवन का पहला अनुभव था इसलिए वो फिलहाल बस मन ही मन उस मृगनयनी को उसकी बेवफ़ाई के लिए याद करते जा रहे थे, ध्यान दीजिएगा कि याद करते जा रहे थे कोस नहीं रहे थे, बल्कि कहीं न कहीं उनके मन में मृगनयनी को कोसने के बजाय अब हल्की हमदर्दी का भाव उभर आ रहा था कि हाय कितनी मजबूरी में रही होगी बेचारी जो ऐसा सुंदर रूप होते हुए बेचारी को चोरी जैसा तुच्छ काम करना पड़ रहा है ।

गूची जी के मन में तो अब ऐसे भाव आ रहे थे कि मानों यदि गूची जी को पहले से पता होता कि वो मृगनयनी उसका सूटकेस टपाने वाली है तो खुद गूची जी अपने जेब से निकालकर सूटकेस में कुछ रूपए रख देते, कम से कम बेचारी उस लड़की की कुछ मदद हो जाती और यदि सूटकेस खोलते ही उस मृगनयनी को कुछ रूपए मिल जाते तो गूची जी की कंगाली भी उजागर होने से बच जाती लेकिन हाय रे संजोग कि जिंदगी पहले से कुछ बताती नहीं ।

ऐसे ही कुछ महान विचारों में लीन गूची जी अपने सीटबर्थ पर किसी विशालकाय कछुए की भांति बिल्कुल शांत पड़े हुए थे, बगल की सीट पर सफ़र कर रहे बुजुर्ग दंपति में से चाची फिर बोल उठी- " बेटा, मन छोटा मत करो, सामने वाले स्टेशन पर उतर कर कम से कम एक शिकायत ही लिखवा देना, अब सूटकेस तो मिलने से रहा कम से कम एक कागज तो रहेगा तुम्हारे पास कि तुम्हारा सूटकेस चोरी हुआ है । क्या पता कहीं रेलवे वालों की तरफ से कुछ हर्जाना ही मिल जाए " चाची की बात सुनकर गूची जी की चेतना थोड़ी वापस आई, उन्होंने सोचा कि बात तो सही है आखिर उनका सूटकेस गायब होने का कुछ तो सबूत होना ही चाहिए और अगर कहीं रेलवे वालें दया धर्म दिखा गए तो उनको अपने छेद युक्त कच्छो का हर्जाना मिलेगा वो अलग ।

इतना सोचते ही आंखों में चमक लिए गूची जी उठने को हुए ही थे कि चाचा जी चाची से बोल पड़े - " हर्जाना ?? क्या बड़बड़ाती हो ? हर्जाना मिले ना मिले पर शिकायत लिखवाने के चक्कर में जो पैसे जेब में है वो भी रिश्र्वत के नाम पर निकल जाएंगे । "

ऐसा कटू सत्य सुनकर गूची जी फिर कछुआ हो गए, किसी ने बिल्कुल सही कहा है कि सच तो कड़वा होता है ।

खैर, जैसे तैसे अपने दिल का दर्द लिए गूची जी का सफ़र और रेल दोनों धीरे धीरे अपने मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे थे । गुनगुने धूप में चल पड़ी रेल अब हाड़ कपकपा देने वाली ठंड कोहरे और रात के अंधेरे से होती हुई धीरे धीरे एक स्टेशन पर सुस्ताने को हुई, ट्रेन के स्टेशन पर रुकते ही बुजुर्ग चचा ने गूची जी को लगभग आदेशात्मक लहजे में साथ में एक कप चाय पी आने को कहा, शायद चचा भीतर ही भीतर गूची जी के मनोभावों को समझ रहे थे, आखिर किसी ज़माने में चचा भी दिल और दिमाग के इसी कैमिकल लोचे से गुज़रे होंगे । वैसे तो चचा को दिली इच्छा थी कि गूची उसके साथ नीचे चाय पीने आए ताकि चचा उसे अपने जवानी की नादानियों से अर्जित करे गए अनुभव और सीख बता सकें, चचा को ऐसा लगता था कि उनके द्वारा दिया गया ज्ञान गूची के दर्दे दिल की दवा बन सकता है क्योंकि इस ज्ञान की बात के मूल में यह तर्क था कि ख़ुबसूरत लड़कियां भोले भाले लड़कों को उल्लू बनाती ही हैं पर यह ज्ञान वो चाची के सामने गूची को नहीं दे सकते थे वरना चाची उनसे उनके जवानी के दिनों का हिसाब मांग बैठती । लाख टोनियाने के बाद भी गूची जी का मन नीचे जाने को नहीं हुआ और चचा को अकेले ही अपने ज्ञान की घुट्टी और चाय पीने नीचे उतरना पड़ा,,

क्रमशः,,,,

सदानन्द कुमार

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गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

Sad Poetry in Hindi || Broken Heart Shayari

Sad Poetry in Hindi || Broken Heart Shayari पोस्ट पर आपका स्वागत है ।

दोस्तों, Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari सदियों से चली आ रही है। ये खुद को व्यक्त करने का एक रूप हैं जो हमें वैसे लोगों से जुड़ने का मौका देता है जिन्होंने ऐसी भावनाओं को जिया हो। ये कविताएँ और शायरियाँ कभी कभी बेहद मार्मिक तो कभी कभी हल्की उदासी लिए हो सकती हैं।


Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari के इतने लोकप्रिय होने का एक कारण यह है कि इन कविताओं और शायरियों को लिखने या पढ़ने से हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और अपने दर्द को समझने में मदद मिल सकती है। यह कविताएं जीवन में हमें कम अकेला भी महसूस करा सकता है।


Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari सुकून देने के अलावा कभी कभी अविश्वसनीय रूप से सुंदर भी होती है। दिल टूटने के दर्द को बयां करने के लिए हम अक्सर रूपकों और ज्वलंत कल्पना का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, एक broken heart की तुलना टूटे हुए आईने से की जा सकती है, या दर्द को एक तूफानी समुद्र के रूप में बयां किया जा सकता है। ये रूपक कविताओं और शायरियों को और अधिक शक्तिशाली बनाते हैं।


 यदि आप एक कठिन समय से गुजर रहे हैं और कुछ आराम की जरूरत है, तो Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari वही हो सकती है जो आपको चाहिए। 

अंत में, Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari  अभिव्यक्ति के शक्तिशाली रूप हैं जो हमें दिल टूटने के साथ आने वाली कठिन भावनाओं को दिशा दिखाने में मदद कर सकते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने अनुभवों में अकेले नहीं हैं। यदि आप दिल टूटने से जूझ रहे हैं, तो इस शैली की कविता आपको काफी सुकून दे सकतीं हैं ।

आईए कुछ Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari देखते हैं ।


1)

आसमां में एक कविता लिख दूं मैं नाम तुम्हारे

परियां जिसे पढ़ती हो और हमारा प्रेम निहारे

छुप कर कमरे में कविताएं पढ़ने तुम आती हो

ये चंदा और जुगनू सारे जाने हैं मनोभाव तुम्हारे


2)

लिखकर मुझे मिटा दिया, भूल गई मम प्रीत

सजल नयन रो रो कहे, तुम मम मन की मीत

शरद ऋतु की सांझ में गौरैया के गीत

गौरैया भी गा रही, तुम संग मम अतीत


3)

डूब जाने से पहले एक बार, दूर तलक तर लेना था,

भींगे नयनों के कोर से तुमरे, पोर पोर भर लेना था,

ठंडे ठहरे ताल में तुम जब जल तरंग बनाती थी,

 निज भवंर भूल कर सबको तुमसे प्रेम कर लेना था,


सदानन्द कुमार समस्तीपुर बिहार

Sad Poetry in Hindi || Broken Heart Shayari

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रविवार, 23 अप्रैल 2023

हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी || राजनीति पर व्यंग्य कविता || ' नेता गर बनना हो '

 || राजनैतिक व्यंग शायरी || राजनीति पर व्यंग्य कविता || हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी पोस्ट पर आपका स्वागत है ।



वैसे तो आप लोग पढ़ें लिखे लोग हैं और इससे पहले आपने अनेकों हास्य व्यंग कविता हिन्दी , राजनैतिक व्यंग शायरी और राजनीति पर व्यंग्य कविता इत्यादि पढ़ रखें होंगे । पढ़ कर पचा भी चुके हैं इसलिए आशा करता हूं कि आप लोग मुझे भी फैलने का अवसर जरूर देंगे ।

दोस्तों जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि आजकल दूसरों की खटिया खड़ी कर देने का दौर है, कोई किसी बहाने मेरी खटिया खड़ी ना कर दे इसलिए मैं पहले ही एक डिस्क्लेमर दे देना चाहता हूं कि यह कविता पूर्णतः मौज मस्ती में लिखी गई कविता है, इसको गंभीरता से न लें और न ही इससे अपनी भावनाओं को आहत होने दें, ये कविता भावनाएं आहत करने के लिए नहीं लिखी गई है ।

हां एक बात और कविता में मात्रा और वर्ण की खामियां निकाल कर मेरी भी भावनाएं आहत न करें । 

छोटा सा कवि उछलना चाहता है तो इसमें आपसब का सहयोग अपेक्षित है, ध्यान रहे उछलना चाहता हूं ऐसा न हो कि आप लोग मुझे कुदा दें वो भी गड्डे में ।

उछलने और कूदने में फर्क होता है भाई !

तो ज्यादा चकलल्स न करते हुए प्रस्तुत है मेरी स्वरचित रचना

' नेता गर बनना हो ' 

( हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी )


नेता गर बनना हो, ये दिल में तमन्ना हो

काम चुन कर कोई, ऐसा नीच कीजिए,


चाहते हो आपको जो, मानते हो आपको जो

खोपचे में ले जाकर, उन्हें मूड़ लीजिए


लंबी लंबी फेंका करें, कभी भी ना झेंपा करें

पप्पु फेंकु होने तक,  फाड़ू  स्पीच दीजिए


मुख पर तेज रहे, इतना करेज रहे

गुरु जी की लंगोटी को , फाड़े फाड़े दीजिए


गाली गुत्था आता ही हो, पद सब भाता ही हो

पैसा चंदा सब कुछ, संत बन लीजिए


कोई गर विरोधी हो, सज्जन भले बोधी हो

बगुला भगत बन, उन्हें रेल दीजिए


बिकास बौखत रहें, ढ़ांचे दरकत रहें

पार्टी दल वाला सर, खेल कर लीजिए


फंसा कर निज पेंच, कर लियो सब केंच

माल मोटा देख कर, मेल कर लीजिए

© सदानन्द कुमार

    समस्तीपुर बिहार

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

हम बिहार के लड़के


1) वैसे तो निज नाम बताना 
हमको व्यर्थ सा लगता है
मेरे अंदर का अर्जून 
शौर्य को सर्वज्ञ समझता है

2) हम बिहार के लड़के हैं
हमने अभावों को जीता है
खुले आसमान के नीचे हमने
 क ख ग घ सीखा है

3) धैर्य न खोना सखा अगर
नैराश्य की स्याही बनी रहे
लक्ष्य पाने तक मित्र मेरे
लगन की ज्योति जली रहे

4) देखो उनका जीवठ भी
योद्धा जो रण में बड़े हुए
कुंद करने को उनकी बुद्धि
लोग कैसे खड़े हुए

5) पद वालों की दृष्टि में 
हम तुम बहुत मामूली है
पर वे ये ना भूले की 
वे भी जनतंत्र की धूली है

6) फ़र्ज़ तो उनका था कि
व्यवस्था ठीक चलाते वे
देश चलाने की खातिर
प्रतिभा चुन कर लाते वे

7) चोखा खिचड़ी खाकर भी
हम मेरिट तो लाते हैं
डिग्री देने वाले सेशन
अक्सर लेट हो जाते हैं

8) ढिल्लम सिलल्म में ना जाने
जवानी कैसे गुम हुई
भविष्य हमारे इन लोगों के
दस्तखत की कुटुंब हुई

9) पटना पढ़ने आया लड़का
जिन सपनों को जीता है
वे क्या जाने तंगहाली में
संघर्षों को कैसे पीता है

10)  करें क्या मेरिटधारी लड़का
गर टैलेंट का मान न हो
चाणक्य जन्मेगी कैसे धरती
गर वक्त पर इम्तिहान न हो


सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार


शनिवार, 12 नवंबर 2022

पूस प्रवास भाग 05 और 06 । हिन्दी कहानियां ।

" पूस प्रवास " भाग- 05
( सफरनामा )


गूची जी के मूल प्रश्नों का निवारण तो लगभग हो चुका था, पर इस सुंदर  नवयुवती से लगातार संवाद की लालसा गूची जी के मन से ना जाती थी, सो रह रह कर एक छोटू मोटू गोलू लोलू सा सवाल नवयुवती की तरफ उछाल देते थे । अब तक तो नवयुवती सामान्य शिष्टाचार और सीट पर टिके रहने की मजबूरी में धैर्य से काम ले रही थी पर अब उसके चंद्रमुखी चेहरे पर खीझ की रेखा लम्बी होती जा रही थी । इस बार भी बड़ी उत्सुकता से गूची जी ने तरूणी के तरफ एक बेहद व्यवहारिक प्रशन फेंका- 
" आपने अभी तक अपना नाम नहीं बताया । "
इस बार थोड़ी खीझ के साथ तरूणी ने गूची को देखा, लड़की के देखने के तेवर से गूची को ऐसा आभास हुआ मानों यह प्रशन पूछ कर उसने इस बार लक्ष्मण रेखा लांघ दी है ।
थोड़ी देर तो लड़की बिल्कुल ही मौन रहीं, मानों अपने क्रोध रूपी विष को कंठ में ही धारण करने की प्रेक्टिस कर रही हो और लड़की को ऐसे मौन हुए देखकर गूची जी ने सोचा कि कहीं ये तूफां से पहले का सन्नाटा तो नहीं पर फिर लड़की ने मुख पर एक उदार कृत्रिम मुस्कान बिखेरते हुए कहा कि- " जी मेरा नाम कल्लू है " 
"अरेर , आप जैसी सुंदर और माडर्न लड़की का नाम कल्लू !!  ये कैसा नाम है, ? " गूची ने बिना किसी विस्मय के साधारण भाव से ये बात कही क्योंकी गूची समझ रहा था कि लड़की ने खीझ कर ये नाम बताया है । इधर लड़की के सब्र का बांध गूची के सवालों के थपेड़े से बस टूटने ही वाला था शायद इसलिए लड़की ने अपने बैग से कुछ दालमूट और चिप्स के पैकेट निकाले और एक पैकेट गूची को भी आॅफर किया । गूची को लगा शायद लड़की सवालों से मुक्ति चाहती है इसलिए मुंह बंद करवाने को चिप्स आॅफर कर रही है, शुरूवाती ना नुकुर के बाद गूची जी ने झेंप कर चिप्स का वो पैकेट ले ही लिया और खाने लगे । गूची को चिप्स खाता देख लड़की के चेहरे पर सुकून के भाव उभरे, गूची को लगा शायद सच में लड़की मेरे सवालों से बोर चुकी थी, फिर गूची ने अपने स्वाभिमान की खातिर मन ही मन तय किया कि अब वो लड़की से कोई बातचीत नहीं करेगा और चुपचाप सो रहेगा ।,,
क्रमशः,,
" पूस प्रवास " भाग- 06
( सफरनामा )
यूं तो कहते हैं कि इंसान अपने संवेदनाओं के कारण ही इंसान हो पाता है, इन संवेदनाओं में प्रेम सबसे ताकतवर संवेदना होती है । इंसान जब किसी मनोभाव के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता है तो उसे किसी दूसरे मनोभाव से प्रतिस्थापित कर लेता है जैसे यदि किसी के प्रति मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाए और यह ईर्ष्या विसराने योग्य ना हो तो धीरे धीरे मन उस ईर्ष्या को द्वेष में बदल लेता है, ठीक वैसे ही जब प्रेम का प्रत्युत्तर प्रेम में ना मिले तो मानव मन को अपना स्वाभिमान याद आता है। इस लड़की के ऐसे तंज भरे लहजे ने भी गूची जी के स्वाभिमान को जागृत कर दिया था, सो संवाद की लाख लालसा होते हुए भी उन्होंने इस लड़की से अब बात ना करने की लगभग कसम खा ली थी, हां लेकिन इतना शिष्टाचार जरूर बनाए हुए थे कि लड़की को बैठने में कोई तकलीफ़ ना हो, सीट के बिल्कुल कोने में बैठी हुई लड़की को पूरी सीट दे देने की प्रबल इच्छा हो रही थी परन्तु अपना स्वाभिमान बार बार आड़े आ जा रहा था, किसी तरह गूची जी अपना हाथ पांव समेटे बर्थ के दूसरे कोने में दुबके हुए थे, कुछ कुछ ये ठंड का भी असर था, ज्यो ज्यो ट्रेन बिहार की तरफ बढ़ती चली जा रही थी ठंड भी पूरी तरह जमीं पर उतर आने को आतुर हो रहा था, कोहरे ने तो वैसे भी ट्रेन के पहियों को भारी कर रखा था, घने कोहरे में बमुश्किल ही आगे का कुछ हिस्सा दिख पाता था, जल्द ही इस सफर ने हसीं शाम के बाद शबनमी रात में प्रवेश किया, वैसे तो ट्रेन के सफर में सो जाना गूची जी के यात्रा कौशल पर प्रश्नचिन्ह के माफिक था, पर पता नहीं कैसे उकडू होकर लेटे हुए होने के बावजूद इस बार उनकी आंख लग गयी थी । आंखें खुली तो कैसा विस्मयकारी परिदृश्य देखा गूची जी ने, लगभग चित्कार भरे लहजे में बगल के बुजुर्ग सहयात्री दंपति से पूछा- " अरेरर, यह लड़की कहां गई, " इतने आत्मविश्वास के साथ गूची ने उस लड़की की खोज लेनी चाही मानों उस लड़की की पूरी जिम्मेदारी परमात्मा ने गूची को ही सौंपी थी । बगल के वृद्ध सज्जन ने कहा - " कहां गई मतलब ? वो तो तुम्हारे साथ थी ना, क्या बिना बताए उतर गई? " 
 गूची ने किसी लूटे पिटे सम्राट के भाव लेते हुए पूछा - " मेरे साथ !! नहीं तो !! मैंने तो बस उसे यहां बैठने भर की जगह दी थी ?? पता नहीं ?? कौन से स्टेशन पर उतर गई ? " 
बुजुर्ग ने मुख मंडल की भाव भंगिमा बिगाड़ते हूए कहा- "अब तुम लोग इतने सहज भाव के साथ चना चबेना का आदान-प्रदान कर रहे थे कि हमें तो लगा कि तुम दोनों साथ में ही हो, जब वो जमुई स्टेशन के पास जाने को हुई तो हमें तो थोड़ा अचरज हुआ पर कुछ बोलना हमने उचित नहीं समझा ।" 
बुजुर्ग की बातें गूची जी के मन मस्तिष्क पर ऐसा आघात कर रही थी मानो गूची जी ने किसी जीती हुई लाॅटरी का टिकट खो दिया हो । 
क्रमशः,,,

सदानन्द कुमार

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सोमवार, 7 नवंबर 2022

पूस प्रवास भाग 3 और भाग 4

" पूस प्रवास " भाग-03

 ( सफरनामा )
यूं तो हम भारतीय लोगों के लिए रेल का सफर महज दो स्थानों के बीच की दूरी तय करने भर की बात नहीं होती । हमारे लिए रेल की यात्रा हर बार एक संस्मरण की जननी होती है, लेकिन जब मन किसी गंभीर चिंतन मनन में लीन हो तब हर सुखद परिस्थिति आनन्द दे ये जरूरी नहीं । हमारे गूची भाई भी किसी तरह रेल मे सवार हो तो गए लेकिन उनका मन अब भी नौकरी और जीवन में ज्ञान के असली निहितार्थ के बीच में झूल रहा था । किसी तरह मन को तात्कालिक विश्राम देकर गूची जी ठसाठस भरें कोच में धीरे धीरे कछुए के माफिक अपना दो सूटकेस लिए अपने सीट के तरफ बढ़े, अपने सीट पर आकर गूची जी ने जैसे ही अपना सूटकेस अपने बर्थ पर टिकाया कि पास खड़ी कोमल काया , आधुनिक मेकअप से सुसज्जित और मनहर ऐटिट्यूड वाली नवयुवती धीरे से गूची जी के सीट पर कोने में सरक कर बैठ गई, वैसे तो अगर इस कोमल काया लड़की के जगह कोई हालात का मारा पुरुष गूची के सीट पर बैठता तो गूची जी इसे अपने अधिकारों का हनन और सीट पर नाजायज अतिक्रमण समझते पर बात यहां कोमल काया मृगनयनी की थी तो मजाल है कि गूची जी के मुख से आपत्ति का आ भी निकल जाए । गूची तो मन ही मन सोच रहे थे कि ससुरा जीवन इतना भी नीरस नहीं जितना वो अभी समझ रहा था, बैठने को तो यह लड़की बगल की सीट पर भी बैठ सकती थी पर मेरे ही सानिध्य में बैठना शायद किसी सुखद परिणीती की सूचक हैं । 
बड़ी ही झिझक से गूची जी ने दांत निपोरे एक बड़ा विनम्र सवाल इस नवयौवना की तरफ दागा- " जी, वो आपकी सीट कौन सी है ? " 
तरूणी ने भी बड़ी आत्मीयता के साथ कहा कि " जी फिलहाल तो मेरी सीट कन्फर्म नहीं है, वेटिंग है, आप बहुत सभ्य और सौम्य लगे इसलिए मैं यहां बैठने का साहस कर पाई । आपको अगर तकलीफ़ ना हो तो क्या मैं यहां थोड़ी देर बैठ जाऊं, टीटी के आते ही मैं कुछ एरेजमेंट कर लूंगी । " 
गूची जी ने इस कन्या के मुख से संपादिक वाक्यों में बस इतना ही सूना कि "आप मुझे बहुत सभ्य और सौम्य लगें, बस इतना ही सूना कि गूची जी के मन में इतना बड़ा लड्डू फूटा कि उसके धमाके में गूची जी ने आगे कुछ सूना ही नहीं, बस भाव विभोर होकर मुण्डी डोलाते रह गए ।
क्रमशः,,,

                      " पूस प्रवास " भाग-04
                              ( सफरनामा )
यूं तो स्त्री पुरुष में आकर्षण के कई आयाम हो सकतें हैं परंतु मानव गुण धर्म पर पीएचडी ढोक चुके स्काॅलरस का ऐसा मानना है कि हास्य विनोद में पारंगत पुरुष, स्त्रियों को, और रूपवती स्त्रियां, पुरुषों को स्वाभिक रूप से आकर्षित करते हैं । हमारे गूची जी भी ऐसे ही रूपवती सहयात्री के सहयोग की कामना करते हुए सफ़र को एन्ज्वाय करते चले जा रहे थे परन्तु वार्तालाप शुरू करने में गूची जी सहजता महसूस नहीं कर पा रहे थे । शायद गूची जी कि इसी असहजता को महसूस करते हुए  नवयौवना ने स्वयं ही संवाद शुरू किया और बड़े ही सौम्य लहज़े में पूछा-" आपने बताया नहीं कि आपको कोई तकलीफ़ तो नहीं अगर मैं यहां थोड़ी देर बैठ जाऊं ।"
गूची जी लगभग घिघयाते हुए बोले-" नहीं नहीं मुझे कोई तकलीफ़ नहीं, आप आराम से बैठे ।" 
इतना कहते हुए गूची जी ने एक प्रशन भी साथ साथ चिपका दिया " क्या आप अकेले सफर कर रही हो ।"
अब लड़की ने अपनी मंद मुस्कान के साथ संवाद में मिश्री घोलते हुए कहा- " यस, आई एम टोटली एलोन, बट ईट्स फाईन । " 
गूची ने मानो ऐसी ब्युटीफुल ईग्लिश जीवन में पहली बार देखा था अअ , मेरा मतलब सुना था😜 पर मदहोशी को कंन्ट्रोल करते हुए बोले -" यस, नो ईश्शू , पर आप अकेली क्यूं , वो भी वेटिंग टिकट के साथ, क्या परेशानी नहीं होगी? "
अब तक लड़की गूची जी के वजन को तौल चुकी थी इसलिए तपाक से बोली " जी  आप जैसे सभ्य लोग के होते हुए , उतनी परेशानी नहीं । वैसे भी मैं यहां कलकत्ते से इंजीनियरिंग कर रही हूं, महीने दो महीने में एक बार घर जाती ही रहतीं हूं, हर बार कन्फर्म टिकट तो नहीं मिलता, मुझे आदत है, वैसे भी मात्र छः सात घंटे का ही सफर है । "
शायद लड़की ने एक बार में इतना सब इसलिए कह बताया ताकि गूची जी के तरफ से अब कोई अवांछित प्रशन ना उठे ,,,
क्रमशः,,,
सदानन्द कुमार
सदानन्द कुमार
Instagram id: @gyani_sada

गुरुवार, 9 जून 2022

Short Hindi stories || Best Hindi novels || Sad love story in Hindi || पूस प्रवास भाग 1 और 2 ||

Short Hindi stories || 
Best Hindi novels || Sad love story in Hindi 

 नमस्कार दोस्तों,
Short Hindi stories || 
Best Hindi novels || Sad love story in Hindi " पूस प्रवास " भाग-01 
( सफरनामा ) के पहले भाग में आप लोगों का स्वागत है ।

पूस प्रवास, यह शीर्षक अपने आप में बहुत अनूठा मालूम होता है मुझे, बस इसलिए मैंने इस कहानी का यह शीर्षक रखा है, यदि हम और आप प्रेमचंद जैसे महान लेखक के समकालीन होते तो बहुत सहजता से अनुमान लगा लेते कि कहानी की पटकथा क्या होगी, लेकिन हमलोग तो 4G परिवेश में फुदकने वाले खरगोश है, हमारी मां हिन्दी जब अपने पूरे सौन्दर्य और श्रृंगार के साथ जब हमारे सामने आ जाती है तो हम भाषायी विद्वान होते हुए भी मां हिन्दी को पढ़ कर समझ नहीं पाते, ठीक वैसे ही जैसे हमें "पूस प्रवास" का मतलब समझ नहीं आया । 
खैर, ढ़ेर चौधरी बनने से अच्छा है कि मैं  यह बता देता हूं कि मैंने इस कहानी का शीर्षक "पूस प्रवास" क्यूं रखा है । मेरी ये कहानी पूस के महीने में प्रवास करते एक नौजवान लड़के गगन प्रताप उर्फ " गूची " की कहानी है, जिसने अभी अभी डिग्री पास करते ही ये जान लिया है कि जिंदगी में अपना मुकाम और अपने मन में जीवठ पैदा करना किसी काॅलेज में नहीं सिखाया जाता । डिग्री वाले लोग अवसर के इंतेज़ार में रहते हैं पर जीवठ के धनी लोग अपने अवसर का निर्माण खुद करते हैं । इतने घनघोर कल्याणकारी मोटीवेशनल कोट्स को अपने लहू में जीने वाला अपना गूची वैसे तो बहुत सयाना है पर उम्र का तकाजा है कि बकलोली और सिल्ली मिस्टेक्स करने की आदत अभी छूटी नहीं है,
Short Hindi stories ||  Best Hindi novels || Sad love story in Hindi

" पूस प्रवास " भाग-02
( सफरनामा )
वैसे तो टटका टटका ग्रेजुएट हुए गूची को दुनियादारी में अपने अनुभवहीन होने का मलाल तो जन्म से ही था, पर इस बात की कसक ज्यादा थी कि ना चाहते हुए भी उससे ना जाने कैसे बलंडर गलतियां हो जाती हैं, वो सब तो फिर भी ठीक था लेकिन गूची को इस बात की सबसे ज़्यादा आपत्ति थी कि दुनिया उसके सरल स्वभाव को बकलोली समझती है । खैर, जो भी हो पर अपने गूची जी पठन पाठन में काफी तेजस्वी थे, इसलिए कलकत्ते के एक MNC की भर्ती प्रक्रिया में सफल हो कर लौट रहे थे । वैसे तो यह दुनिया अब गूची जैसे निरीह प्राणियों के रहने लायक नहीं है लेकिन कलकत्ता फिर भी कुछ ठीक है, ऐसा स्वयं गूची जी का मानना था, बकौल गूची जी, कलकत्ता में माछ भात से लेकर मूढ़ी भात खाने वाले सबों का गुजारा संभव है । चूंकि गूची जी अपने एकेडमिक में काफ़ी अच्छे छात्र रहे थे, इसलिए व्यक्तित्व निर्माण में पढ़ाई-लिखाई का महत्व समझते थे, पर काॅलेज खत्म कर लेने के बाद जीवन में कुछ कुछ निरर्थकता का भाव आ गया था, ऐसा लगने लगा था मानो जवानी की आहुति देकर जो डिग्रियां प्राप्त की है उनका तो प्रयोजन बस इतना भर था कि किसी तरह एक नौकरी लग जाए । अब नौकरी भी सुनिश्चित ही थी पर गूची जी का कलेजा यह सोच सोच कर हलकान हुए जा रहा था कि जीवन क्या सच में इतना निरस है ? पहले स्कूल फिर काॅलेज फिर नौकरी , ऐसे में तो एक आम इंसान आध्यात्म, दर्शन, नीति इत्यादि और महापुरुषों के दिए उपदेशों और ज्ञान की बातों से बिल्कुल अलग अलग ही रह जाएगा, ऐसे में तो एक आम इंसान ज्ञानार्जन करने से बिल्कुल ही चूक जाएगा । ऐसे कई अंतर्द्वंदों से घिरा हुआ गूची हावड़ा स्टेशन पर बैठा अपने आत्म अवलोकन में इतना विलीन हो चुका था कि उसे आभास ही ना हुआ कि उसकी ट्रेन अपने निर्धारित प्लेटफार्म पर खड़ी हो चुकी है और बस रवानगी को तैयार है, जैसे तैसे आखिरी सीटी से पहले गूची भागता हुआ अपने कोच में सवार हो पाया, नौकरी मिलने की जो खुशी उसे पहले अंदर तक गुदगुदाए दे रही थी वो खुशी अब गुची के मन में विचलन के रूप में बदल रही थी ।
क्रमशः,,,
सदानन्द कुमार

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रविवार, 5 जून 2022

शाम की धूप

हर मौसम में तुम्हारा एक ख़त मिला मुझे । मई जून कि गर्म शाम, जब इस बड़े से लाईब्रेरी के रौशनदानों से शाम चार बजे के बाद कि धूप आती है और उस धूप कि किरणों में उड़ते हुए धूल कण चमक रहे होते हैं, ठीक उसी वक़्त डाकिया अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ आया और तुम्हारा पत्र दे गया था । वैसे तो इस लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन की नौकरी करते हुए कभी कभी भयानक एकाकीपन महसूस होता है, मानों किसी बड़े अंधेरे भवन में बंद एक निरीह प्राणी । लाइब्रेरी मानों किताबों का समंदर पर इस समंदर में पतवार या कश्ती खेने वाला कोई नहीं, शायद अब युवाओं को लाईब्रेरी याद नहीं , इसलिए शायद अब यहां एक दो विद्यार्थियों के अलावा कोई नहीं आता, यहां बस आती है तो शाम चार बजे के बाद वाली धूप । उस रोज तुम्हारी चिट्ठी मिलने से उस रोज का मौसम, वो वक़्त मेरे ज़हन में छप चुका है और आज भी इस मूसलाधार बारिश में डाकिया और तुम्हारी चिट्ठी दोनों आए, डाकिया और बारिश दोनों तो जा चुके हैं अभी, और मैं लाइब्रेरी की भींगी हुई खिड़कियों और जंगलों पर लटके हुए इन बूंदों को देखकर यही सोचता हूं कि शायद इस भींगी खिड़कियों की तरह मेरा मन भी भींग जाए जैसे ही मैं तुम्हारी चिट्ठी खोलूं, इसलिए कहता हूं कि हर मौसम में तुम्हारा ख़त मिला मुझे या यूं कहूं कि तुम्हारे हर ख़त में एक मौसम मिला मुझे ।,,
सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार

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