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रविवार, 23 अप्रैल 2023

हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी || राजनीति पर व्यंग्य कविता || ' नेता गर बनना हो '

 || राजनैतिक व्यंग शायरी || राजनीति पर व्यंग्य कविता || हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी पोस्ट पर आपका स्वागत है ।



वैसे तो आप लोग पढ़ें लिखे लोग हैं और इससे पहले आपने अनेकों हास्य व्यंग कविता हिन्दी , राजनैतिक व्यंग शायरी और राजनीति पर व्यंग्य कविता इत्यादि पढ़ रखें होंगे । पढ़ कर पचा भी चुके हैं इसलिए आशा करता हूं कि आप लोग मुझे भी फैलने का अवसर जरूर देंगे ।

दोस्तों जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि आजकल दूसरों की खटिया खड़ी कर देने का दौर है, कोई किसी बहाने मेरी खटिया खड़ी ना कर दे इसलिए मैं पहले ही एक डिस्क्लेमर दे देना चाहता हूं कि यह कविता पूर्णतः मौज मस्ती में लिखी गई कविता है, इसको गंभीरता से न लें और न ही इससे अपनी भावनाओं को आहत होने दें, ये कविता भावनाएं आहत करने के लिए नहीं लिखी गई है ।

हां एक बात और कविता में मात्रा और वर्ण की खामियां निकाल कर मेरी भी भावनाएं आहत न करें । 

छोटा सा कवि उछलना चाहता है तो इसमें आपसब का सहयोग अपेक्षित है, ध्यान रहे उछलना चाहता हूं ऐसा न हो कि आप लोग मुझे कुदा दें वो भी गड्डे में ।

उछलने और कूदने में फर्क होता है भाई !

तो ज्यादा चकलल्स न करते हुए प्रस्तुत है मेरी स्वरचित रचना

' नेता गर बनना हो ' 

( हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी )


नेता गर बनना हो, ये दिल में तमन्ना हो

काम चुन कर कोई, ऐसा नीच कीजिए,


चाहते हो आपको जो, मानते हो आपको जो

खोपचे में ले जाकर, उन्हें मूड़ लीजिए


लंबी लंबी फेंका करें, कभी भी ना झेंपा करें

पप्पु फेंकु होने तक,  फाड़ू  स्पीच दीजिए


मुख पर तेज रहे, इतना करेज रहे

गुरु जी की लंगोटी को , फाड़े फाड़े दीजिए


गाली गुत्था आता ही हो, पद सब भाता ही हो

पैसा चंदा सब कुछ, संत बन लीजिए


कोई गर विरोधी हो, सज्जन भले बोधी हो

बगुला भगत बन, उन्हें रेल दीजिए


बिकास बौखत रहें, ढ़ांचे दरकत रहें

पार्टी दल वाला सर, खेल कर लीजिए


फंसा कर निज पेंच, कर लियो सब केंच

माल मोटा देख कर, मेल कर लीजिए

© सदानन्द कुमार

    समस्तीपुर बिहार

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

हम बिहार के लड़के


1) वैसे तो निज नाम बताना 
हमको व्यर्थ सा लगता है
मेरे अंदर का अर्जून 
शौर्य को सर्वज्ञ समझता है

2) हम बिहार के लड़के हैं
हमने अभावों को जीता है
खुले आसमान के नीचे हमने
 क ख ग घ सीखा है

3) धैर्य न खोना सखा अगर
नैराश्य की स्याही बनी रहे
लक्ष्य पाने तक मित्र मेरे
लगन की ज्योति जली रहे

4) देखो उनका जीवठ भी
योद्धा जो रण में बड़े हुए
कुंद करने को उनकी बुद्धि
लोग कैसे खड़े हुए

5) पद वालों की दृष्टि में 
हम तुम बहुत मामूली है
पर वे ये ना भूले की 
वे भी जनतंत्र की धूली है

6) फ़र्ज़ तो उनका था कि
व्यवस्था ठीक चलाते वे
देश चलाने की खातिर
प्रतिभा चुन कर लाते वे

7) चोखा खिचड़ी खाकर भी
हम मेरिट तो लाते हैं
डिग्री देने वाले सेशन
अक्सर लेट हो जाते हैं

8) ढिल्लम सिलल्म में ना जाने
जवानी कैसे गुम हुई
भविष्य हमारे इन लोगों के
दस्तखत की कुटुंब हुई

9) पटना पढ़ने आया लड़का
जिन सपनों को जीता है
वे क्या जाने तंगहाली में
संघर्षों को कैसे पीता है

10)  करें क्या मेरिटधारी लड़का
गर टैलेंट का मान न हो
चाणक्य जन्मेगी कैसे धरती
गर वक्त पर इम्तिहान न हो


सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार


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