बुधवार, 17 मई 2023

Hindi Shayari || Poets from Samastipur

Hindi Shayari || Poets from Samastipur

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लिखी अपनी कहानी में तुझे मैंने बताया है

जहां ऐसी जरूरत थी वहां तुझको छिपाया है

रहे तेरी खुमारी में दिया उसका किराया है

लिखा जो कुछ कभी मैंने सुनो वो भी बकाया है


सदानन्द कुमार 

समस्तीपुर बिहार

सभीपुर के कवि सदानंद कुमार









साथ छूटा मैं तमाशा बन गया

ख्वाब टूटा मैं फसाना बन गया

सोचता था मैं अनाड़ी हूं अभी

यार उसका मैं ठिकाना बन गया 


मुहब्बत में दिवानो ने यहां सब कुछ लुटाया है 

असासा बेचकर अपना गिफट उसको दिलाया है

जमाना भूल जाएगा सितम ये की यहां तूने

पुरानी आशिकी के नाम का टैटू छुपाया है

सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार


प्रेम करके हमी से छिपाती रही
गीत मेरे हमेशा सजाती रही
हार कर प्रेम में ना कबूला कभी
हार को जीत नित ही बताती रही

हाथ लाली लगाकर दिखाती रही
‍नाम मेरा हिना से बनाती रही
रंग दो ही सुने थे अभी और वो
ओढ़नी पे कई रंग लाती रही
किधर जाएंगे
तुमको लगता है कि सुधर जाएंगे
सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार

शनिवार, 6 मई 2023

पूस प्रवास भाग 09 और 10 || Short Stories in Hindi || Hindi Kahani || Desi Kahani

Welcome to Short Stories in Hindi || Hindi Kahani blog.

पूस प्रवास भाग 09

सफरनामा

बीच सफर में अपने चोरी हो चुके सूटकेस से गूची जी का मन अब इतना विचलित हो चुका था कि अब गूची जी को समूचा संसार ही 420 बुझा रहा था, पर कहीं ना कहीं उनका मासूम दिल ये भी मानने को तैयार नहीं हो रहा था कि इतनी शांतचित्त मृगनयनी सुंदरी उसका सूटकेस उठाने जैसा तुच्छ काम करेगी, बात विचार और आभामंडल से तो वो किसी प्रेमनगर की प्रिसेंस लग रही थी।

अब प्रिंसेस सरीखी लड़कियां अगर ट्रेन के स्लीपर क्लास में नीरीह जनता के सूटकेस टपाने लगे तो ये बेचारे चोर उचक्के और जगत में विचरन कर रहे लफंडरों के सामने तो रोजगार की विकट समस्या उत्पन्न हो जाएगी ।

ऐसे ही कई ऊटपटांग विचारों में मुग्ध गूची जी ऐसे सुन्न से बैठे मालूम पड़ रहे थे मानों अपनी अंतरात्मा से अपने सूटकेस के मुक्ति का मार्ग पूछ रहे हों । गूची जी को इतने गंभीर चिंतन में गुम देख सहयात्रियों को ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो गयी कि गूची जी को सूटकेस का बहुत गंभीर सदमा लगा है । सामने बैठे बुजुर्ग दंपति में से चाचा जी को तो गूची जी पर तनिक भी दया नहीं आई पर गूची जी को ऐसे मौन बैठे देख चाची के दिल में थोड़ी करूणा आई और ममत्व वश वह पूछ बैठी कि बेटा सूटकेस में कोई बहुत जरूरी चीजें थी क्या ? इससे पहले कि गूची जी हां या नहीं कहते चाचा जी बोल पड़े - " अरे ! अगर जरूरी चीजें नहीं होती तो ये अपने छाती पर लादकर उस सूटकेस को क्यूं लाता ? " यह सुनकर गूची जी ने निरूत्तर रहना ही ठीक समझा पर यह सवाल सुनकर गूची जी के मन में एक बात कौंधी कि सूटकेस में तो ऐसे कई जरूरी सामान थे पर एक दो फटेहाल बनियान और छेद युक्त कच्छे भी तो थे, भले ही उस सुंदरी ने चोरी के इरादे से सूटकेस उठाया था पर सूटकेस खोलते ही वो मेरे फटेहाली से अवगत हो जाएगी । ये सोचकर गूची जी के आंखों के सामने और भी अंधेरा छाने लगा। 

यूं तो संसार में यह बात व्याप्त है कि पुरुष का मन बड़ा ही कठोर होता है पर बात अगर किसी नवयौवना की हो तो गूची जी जैसे पुरुष बड़े उदार मन से उसके लिए अपना सूटकेस तो क्या अपनी जमीन जायदाद भी लूटा देते, ऐसे पुरुष नवयुवती के लिए हमेशा क्षमाशील बने रहते हैं, चाहें नवयुवतियां उनकी लंका ही क्यूं ना लगा दें पर इतने उदार हृदय से क्षमाशील बने रहने का कभी कभी कोई फायदा नहीं क्योंकि नए कल्चर के लोग इसे ठरकपन के रूप में परिभाषित कर देते हैं, खैर,, जो भी हो,,

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" पूस प्रवास भाग 10 "

वैसे तो सफ़र में लूट जाने का एहसास इतना भारी है कि इस पर कई तरह के मारक और दिल का दर्द बयां करते हुए कई तरह के शेरों शायरी व नगमें लिखें जा सकतें है पर चूंकि अपने गूची जी के लिए यह जीवन का पहला अनुभव था इसलिए वो फिलहाल बस मन ही मन उस मृगनयनी को उसकी बेवफ़ाई के लिए याद करते जा रहे थे, ध्यान दीजिएगा कि याद करते जा रहे थे कोस नहीं रहे थे, बल्कि कहीं न कहीं उनके मन में मृगनयनी को कोसने के बजाय अब हल्की हमदर्दी का भाव उभर आ रहा था कि हाय कितनी मजबूरी में रही होगी बेचारी जो ऐसा सुंदर रूप होते हुए बेचारी को चोरी जैसा तुच्छ काम करना पड़ रहा है ।

गूची जी के मन में तो अब ऐसे भाव आ रहे थे कि मानों यदि गूची जी को पहले से पता होता कि वो मृगनयनी उसका सूटकेस टपाने वाली है तो खुद गूची जी अपने जेब से निकालकर सूटकेस में कुछ रूपए रख देते, कम से कम बेचारी उस लड़की की कुछ मदद हो जाती और यदि सूटकेस खोलते ही उस मृगनयनी को कुछ रूपए मिल जाते तो गूची जी की कंगाली भी उजागर होने से बच जाती लेकिन हाय रे संजोग कि जिंदगी पहले से कुछ बताती नहीं ।

ऐसे ही कुछ महान विचारों में लीन गूची जी अपने सीटबर्थ पर किसी विशालकाय कछुए की भांति बिल्कुल शांत पड़े हुए थे, बगल की सीट पर सफ़र कर रहे बुजुर्ग दंपति में से चाची फिर बोल उठी- " बेटा, मन छोटा मत करो, सामने वाले स्टेशन पर उतर कर कम से कम एक शिकायत ही लिखवा देना, अब सूटकेस तो मिलने से रहा कम से कम एक कागज तो रहेगा तुम्हारे पास कि तुम्हारा सूटकेस चोरी हुआ है । क्या पता कहीं रेलवे वालों की तरफ से कुछ हर्जाना ही मिल जाए " चाची की बात सुनकर गूची जी की चेतना थोड़ी वापस आई, उन्होंने सोचा कि बात तो सही है आखिर उनका सूटकेस गायब होने का कुछ तो सबूत होना ही चाहिए और अगर कहीं रेलवे वालें दया धर्म दिखा गए तो उनको अपने छेद युक्त कच्छो का हर्जाना मिलेगा वो अलग ।

इतना सोचते ही आंखों में चमक लिए गूची जी उठने को हुए ही थे कि चाचा जी चाची से बोल पड़े - " हर्जाना ?? क्या बड़बड़ाती हो ? हर्जाना मिले ना मिले पर शिकायत लिखवाने के चक्कर में जो पैसे जेब में है वो भी रिश्र्वत के नाम पर निकल जाएंगे । "

ऐसा कटू सत्य सुनकर गूची जी फिर कछुआ हो गए, किसी ने बिल्कुल सही कहा है कि सच तो कड़वा होता है ।

खैर, जैसे तैसे अपने दिल का दर्द लिए गूची जी का सफ़र और रेल दोनों धीरे धीरे अपने मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे थे । गुनगुने धूप में चल पड़ी रेल अब हाड़ कपकपा देने वाली ठंड कोहरे और रात के अंधेरे से होती हुई धीरे धीरे एक स्टेशन पर सुस्ताने को हुई, ट्रेन के स्टेशन पर रुकते ही बुजुर्ग चचा ने गूची जी को लगभग आदेशात्मक लहजे में साथ में एक कप चाय पी आने को कहा, शायद चचा भीतर ही भीतर गूची जी के मनोभावों को समझ रहे थे, आखिर किसी ज़माने में चचा भी दिल और दिमाग के इसी कैमिकल लोचे से गुज़रे होंगे । वैसे तो चचा को दिली इच्छा थी कि गूची उसके साथ नीचे चाय पीने आए ताकि चचा उसे अपने जवानी की नादानियों से अर्जित करे गए अनुभव और सीख बता सकें, चचा को ऐसा लगता था कि उनके द्वारा दिया गया ज्ञान गूची के दर्दे दिल की दवा बन सकता है क्योंकि इस ज्ञान की बात के मूल में यह तर्क था कि ख़ुबसूरत लड़कियां भोले भाले लड़कों को उल्लू बनाती ही हैं पर यह ज्ञान वो चाची के सामने गूची को नहीं दे सकते थे वरना चाची उनसे उनके जवानी के दिनों का हिसाब मांग बैठती । लाख टोनियाने के बाद भी गूची जी का मन नीचे जाने को नहीं हुआ और चचा को अकेले ही अपने ज्ञान की घुट्टी और चाय पीने नीचे उतरना पड़ा,,

क्रमशः,,,,

सदानन्द कुमार

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गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

Sad Poetry in Hindi || Broken Heart Shayari

Sad Poetry in Hindi || Broken Heart Shayari पोस्ट पर आपका स्वागत है ।

दोस्तों, Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari सदियों से चली आ रही है। ये खुद को व्यक्त करने का एक रूप हैं जो हमें वैसे लोगों से जुड़ने का मौका देता है जिन्होंने ऐसी भावनाओं को जिया हो। ये कविताएँ और शायरियाँ कभी कभी बेहद मार्मिक तो कभी कभी हल्की उदासी लिए हो सकती हैं।


Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari के इतने लोकप्रिय होने का एक कारण यह है कि इन कविताओं और शायरियों को लिखने या पढ़ने से हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और अपने दर्द को समझने में मदद मिल सकती है। यह कविताएं जीवन में हमें कम अकेला भी महसूस करा सकता है।


Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari सुकून देने के अलावा कभी कभी अविश्वसनीय रूप से सुंदर भी होती है। दिल टूटने के दर्द को बयां करने के लिए हम अक्सर रूपकों और ज्वलंत कल्पना का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, एक broken heart की तुलना टूटे हुए आईने से की जा सकती है, या दर्द को एक तूफानी समुद्र के रूप में बयां किया जा सकता है। ये रूपक कविताओं और शायरियों को और अधिक शक्तिशाली बनाते हैं।


 यदि आप एक कठिन समय से गुजर रहे हैं और कुछ आराम की जरूरत है, तो Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari वही हो सकती है जो आपको चाहिए। 

अंत में, Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari  अभिव्यक्ति के शक्तिशाली रूप हैं जो हमें दिल टूटने के साथ आने वाली कठिन भावनाओं को दिशा दिखाने में मदद कर सकते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने अनुभवों में अकेले नहीं हैं। यदि आप दिल टूटने से जूझ रहे हैं, तो इस शैली की कविता आपको काफी सुकून दे सकतीं हैं ।

आईए कुछ Sad Poetry in Hindi और Broken Heart Shayari देखते हैं ।


1)

आसमां में एक कविता लिख दूं मैं नाम तुम्हारे

परियां जिसे पढ़ती हो और हमारा प्रेम निहारे

छुप कर कमरे में कविताएं पढ़ने तुम आती हो

ये चंदा और जुगनू सारे जाने हैं मनोभाव तुम्हारे


2)

लिखकर मुझे मिटा दिया, भूल गई मम प्रीत

सजल नयन रो रो कहे, तुम मम मन की मीत

शरद ऋतु की सांझ में गौरैया के गीत

गौरैया भी गा रही, तुम संग मम अतीत


3)

डूब जाने से पहले एक बार, दूर तलक तर लेना था,

भींगे नयनों के कोर से तुमरे, पोर पोर भर लेना था,

ठंडे ठहरे ताल में तुम जब जल तरंग बनाती थी,

 निज भवंर भूल कर सबको तुमसे प्रेम कर लेना था,


सदानन्द कुमार समस्तीपुर बिहार

Sad Poetry in Hindi || Broken Heart Shayari

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रविवार, 23 अप्रैल 2023

हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी || राजनीति पर व्यंग्य कविता || ' नेता गर बनना हो '

 || राजनैतिक व्यंग शायरी || राजनीति पर व्यंग्य कविता || हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी पोस्ट पर आपका स्वागत है ।



वैसे तो आप लोग पढ़ें लिखे लोग हैं और इससे पहले आपने अनेकों हास्य व्यंग कविता हिन्दी , राजनैतिक व्यंग शायरी और राजनीति पर व्यंग्य कविता इत्यादि पढ़ रखें होंगे । पढ़ कर पचा भी चुके हैं इसलिए आशा करता हूं कि आप लोग मुझे भी फैलने का अवसर जरूर देंगे ।

दोस्तों जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि आजकल दूसरों की खटिया खड़ी कर देने का दौर है, कोई किसी बहाने मेरी खटिया खड़ी ना कर दे इसलिए मैं पहले ही एक डिस्क्लेमर दे देना चाहता हूं कि यह कविता पूर्णतः मौज मस्ती में लिखी गई कविता है, इसको गंभीरता से न लें और न ही इससे अपनी भावनाओं को आहत होने दें, ये कविता भावनाएं आहत करने के लिए नहीं लिखी गई है ।

हां एक बात और कविता में मात्रा और वर्ण की खामियां निकाल कर मेरी भी भावनाएं आहत न करें । 

छोटा सा कवि उछलना चाहता है तो इसमें आपसब का सहयोग अपेक्षित है, ध्यान रहे उछलना चाहता हूं ऐसा न हो कि आप लोग मुझे कुदा दें वो भी गड्डे में ।

उछलने और कूदने में फर्क होता है भाई !

तो ज्यादा चकलल्स न करते हुए प्रस्तुत है मेरी स्वरचित रचना

' नेता गर बनना हो ' 

( हास्य व्यंग कविता हिन्दी || राजनैतिक व्यंग शायरी )


नेता गर बनना हो, ये दिल में तमन्ना हो

काम चुन कर कोई, ऐसा नीच कीजिए,


चाहते हो आपको जो, मानते हो आपको जो

खोपचे में ले जाकर, उन्हें मूड़ लीजिए


लंबी लंबी फेंका करें, कभी भी ना झेंपा करें

पप्पु फेंकु होने तक,  फाड़ू  स्पीच दीजिए


मुख पर तेज रहे, इतना करेज रहे

गुरु जी की लंगोटी को , फाड़े फाड़े दीजिए


गाली गुत्था आता ही हो, पद सब भाता ही हो

पैसा चंदा सब कुछ, संत बन लीजिए


कोई गर विरोधी हो, सज्जन भले बोधी हो

बगुला भगत बन, उन्हें रेल दीजिए


बिकास बौखत रहें, ढ़ांचे दरकत रहें

पार्टी दल वाला सर, खेल कर लीजिए


फंसा कर निज पेंच, कर लियो सब केंच

माल मोटा देख कर, मेल कर लीजिए

© सदानन्द कुमार

    समस्तीपुर बिहार

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

हम बिहार के लड़के


1) वैसे तो निज नाम बताना 
हमको व्यर्थ सा लगता है
मेरे अंदर का अर्जून 
शौर्य को सर्वज्ञ समझता है

2) हम बिहार के लड़के हैं
हमने अभावों को जीता है
खुले आसमान के नीचे हमने
 क ख ग घ सीखा है

3) धैर्य न खोना सखा अगर
नैराश्य की स्याही बनी रहे
लक्ष्य पाने तक मित्र मेरे
लगन की ज्योति जली रहे

4) देखो उनका जीवठ भी
योद्धा जो रण में बड़े हुए
कुंद करने को उनकी बुद्धि
लोग कैसे खड़े हुए

5) पद वालों की दृष्टि में 
हम तुम बहुत मामूली है
पर वे ये ना भूले की 
वे भी जनतंत्र की धूली है

6) फ़र्ज़ तो उनका था कि
व्यवस्था ठीक चलाते वे
देश चलाने की खातिर
प्रतिभा चुन कर लाते वे

7) चोखा खिचड़ी खाकर भी
हम मेरिट तो लाते हैं
डिग्री देने वाले सेशन
अक्सर लेट हो जाते हैं

8) ढिल्लम सिलल्म में ना जाने
जवानी कैसे गुम हुई
भविष्य हमारे इन लोगों के
दस्तखत की कुटुंब हुई

9) पटना पढ़ने आया लड़का
जिन सपनों को जीता है
वे क्या जाने तंगहाली में
संघर्षों को कैसे पीता है

10)  करें क्या मेरिटधारी लड़का
गर टैलेंट का मान न हो
चाणक्य जन्मेगी कैसे धरती
गर वक्त पर इम्तिहान न हो


सदानन्द कुमार
समस्तीपुर बिहार


शनिवार, 12 नवंबर 2022

पूस प्रवास भाग 05 और 06 । हिन्दी कहानियां ।

" पूस प्रवास " भाग- 05
( सफरनामा )


गूची जी के मूल प्रश्नों का निवारण तो लगभग हो चुका था, पर इस सुंदर  नवयुवती से लगातार संवाद की लालसा गूची जी के मन से ना जाती थी, सो रह रह कर एक छोटू मोटू गोलू लोलू सा सवाल नवयुवती की तरफ उछाल देते थे । अब तक तो नवयुवती सामान्य शिष्टाचार और सीट पर टिके रहने की मजबूरी में धैर्य से काम ले रही थी पर अब उसके चंद्रमुखी चेहरे पर खीझ की रेखा लम्बी होती जा रही थी । इस बार भी बड़ी उत्सुकता से गूची जी ने तरूणी के तरफ एक बेहद व्यवहारिक प्रशन फेंका- 
" आपने अभी तक अपना नाम नहीं बताया । "
इस बार थोड़ी खीझ के साथ तरूणी ने गूची को देखा, लड़की के देखने के तेवर से गूची को ऐसा आभास हुआ मानों यह प्रशन पूछ कर उसने इस बार लक्ष्मण रेखा लांघ दी है ।
थोड़ी देर तो लड़की बिल्कुल ही मौन रहीं, मानों अपने क्रोध रूपी विष को कंठ में ही धारण करने की प्रेक्टिस कर रही हो और लड़की को ऐसे मौन हुए देखकर गूची जी ने सोचा कि कहीं ये तूफां से पहले का सन्नाटा तो नहीं पर फिर लड़की ने मुख पर एक उदार कृत्रिम मुस्कान बिखेरते हुए कहा कि- " जी मेरा नाम कल्लू है " 
"अरेर , आप जैसी सुंदर और माडर्न लड़की का नाम कल्लू !!  ये कैसा नाम है, ? " गूची ने बिना किसी विस्मय के साधारण भाव से ये बात कही क्योंकी गूची समझ रहा था कि लड़की ने खीझ कर ये नाम बताया है । इधर लड़की के सब्र का बांध गूची के सवालों के थपेड़े से बस टूटने ही वाला था शायद इसलिए लड़की ने अपने बैग से कुछ दालमूट और चिप्स के पैकेट निकाले और एक पैकेट गूची को भी आॅफर किया । गूची को लगा शायद लड़की सवालों से मुक्ति चाहती है इसलिए मुंह बंद करवाने को चिप्स आॅफर कर रही है, शुरूवाती ना नुकुर के बाद गूची जी ने झेंप कर चिप्स का वो पैकेट ले ही लिया और खाने लगे । गूची को चिप्स खाता देख लड़की के चेहरे पर सुकून के भाव उभरे, गूची को लगा शायद सच में लड़की मेरे सवालों से बोर चुकी थी, फिर गूची ने अपने स्वाभिमान की खातिर मन ही मन तय किया कि अब वो लड़की से कोई बातचीत नहीं करेगा और चुपचाप सो रहेगा ।,,
क्रमशः,,
" पूस प्रवास " भाग- 06
( सफरनामा )
यूं तो कहते हैं कि इंसान अपने संवेदनाओं के कारण ही इंसान हो पाता है, इन संवेदनाओं में प्रेम सबसे ताकतवर संवेदना होती है । इंसान जब किसी मनोभाव के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता है तो उसे किसी दूसरे मनोभाव से प्रतिस्थापित कर लेता है जैसे यदि किसी के प्रति मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाए और यह ईर्ष्या विसराने योग्य ना हो तो धीरे धीरे मन उस ईर्ष्या को द्वेष में बदल लेता है, ठीक वैसे ही जब प्रेम का प्रत्युत्तर प्रेम में ना मिले तो मानव मन को अपना स्वाभिमान याद आता है। इस लड़की के ऐसे तंज भरे लहजे ने भी गूची जी के स्वाभिमान को जागृत कर दिया था, सो संवाद की लाख लालसा होते हुए भी उन्होंने इस लड़की से अब बात ना करने की लगभग कसम खा ली थी, हां लेकिन इतना शिष्टाचार जरूर बनाए हुए थे कि लड़की को बैठने में कोई तकलीफ़ ना हो, सीट के बिल्कुल कोने में बैठी हुई लड़की को पूरी सीट दे देने की प्रबल इच्छा हो रही थी परन्तु अपना स्वाभिमान बार बार आड़े आ जा रहा था, किसी तरह गूची जी अपना हाथ पांव समेटे बर्थ के दूसरे कोने में दुबके हुए थे, कुछ कुछ ये ठंड का भी असर था, ज्यो ज्यो ट्रेन बिहार की तरफ बढ़ती चली जा रही थी ठंड भी पूरी तरह जमीं पर उतर आने को आतुर हो रहा था, कोहरे ने तो वैसे भी ट्रेन के पहियों को भारी कर रखा था, घने कोहरे में बमुश्किल ही आगे का कुछ हिस्सा दिख पाता था, जल्द ही इस सफर ने हसीं शाम के बाद शबनमी रात में प्रवेश किया, वैसे तो ट्रेन के सफर में सो जाना गूची जी के यात्रा कौशल पर प्रश्नचिन्ह के माफिक था, पर पता नहीं कैसे उकडू होकर लेटे हुए होने के बावजूद इस बार उनकी आंख लग गयी थी । आंखें खुली तो कैसा विस्मयकारी परिदृश्य देखा गूची जी ने, लगभग चित्कार भरे लहजे में बगल के बुजुर्ग सहयात्री दंपति से पूछा- " अरेरर, यह लड़की कहां गई, " इतने आत्मविश्वास के साथ गूची ने उस लड़की की खोज लेनी चाही मानों उस लड़की की पूरी जिम्मेदारी परमात्मा ने गूची को ही सौंपी थी । बगल के वृद्ध सज्जन ने कहा - " कहां गई मतलब ? वो तो तुम्हारे साथ थी ना, क्या बिना बताए उतर गई? " 
 गूची ने किसी लूटे पिटे सम्राट के भाव लेते हुए पूछा - " मेरे साथ !! नहीं तो !! मैंने तो बस उसे यहां बैठने भर की जगह दी थी ?? पता नहीं ?? कौन से स्टेशन पर उतर गई ? " 
बुजुर्ग ने मुख मंडल की भाव भंगिमा बिगाड़ते हूए कहा- "अब तुम लोग इतने सहज भाव के साथ चना चबेना का आदान-प्रदान कर रहे थे कि हमें तो लगा कि तुम दोनों साथ में ही हो, जब वो जमुई स्टेशन के पास जाने को हुई तो हमें तो थोड़ा अचरज हुआ पर कुछ बोलना हमने उचित नहीं समझा ।" 
बुजुर्ग की बातें गूची जी के मन मस्तिष्क पर ऐसा आघात कर रही थी मानो गूची जी ने किसी जीती हुई लाॅटरी का टिकट खो दिया हो । 
क्रमशः,,,

सदानन्द कुमार

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सोमवार, 7 नवंबर 2022

पूस प्रवास भाग 3 और भाग 4

" पूस प्रवास " भाग-03

 ( सफरनामा )
यूं तो हम भारतीय लोगों के लिए रेल का सफर महज दो स्थानों के बीच की दूरी तय करने भर की बात नहीं होती । हमारे लिए रेल की यात्रा हर बार एक संस्मरण की जननी होती है, लेकिन जब मन किसी गंभीर चिंतन मनन में लीन हो तब हर सुखद परिस्थिति आनन्द दे ये जरूरी नहीं । हमारे गूची भाई भी किसी तरह रेल मे सवार हो तो गए लेकिन उनका मन अब भी नौकरी और जीवन में ज्ञान के असली निहितार्थ के बीच में झूल रहा था । किसी तरह मन को तात्कालिक विश्राम देकर गूची जी ठसाठस भरें कोच में धीरे धीरे कछुए के माफिक अपना दो सूटकेस लिए अपने सीट के तरफ बढ़े, अपने सीट पर आकर गूची जी ने जैसे ही अपना सूटकेस अपने बर्थ पर टिकाया कि पास खड़ी कोमल काया , आधुनिक मेकअप से सुसज्जित और मनहर ऐटिट्यूड वाली नवयुवती धीरे से गूची जी के सीट पर कोने में सरक कर बैठ गई, वैसे तो अगर इस कोमल काया लड़की के जगह कोई हालात का मारा पुरुष गूची के सीट पर बैठता तो गूची जी इसे अपने अधिकारों का हनन और सीट पर नाजायज अतिक्रमण समझते पर बात यहां कोमल काया मृगनयनी की थी तो मजाल है कि गूची जी के मुख से आपत्ति का आ भी निकल जाए । गूची तो मन ही मन सोच रहे थे कि ससुरा जीवन इतना भी नीरस नहीं जितना वो अभी समझ रहा था, बैठने को तो यह लड़की बगल की सीट पर भी बैठ सकती थी पर मेरे ही सानिध्य में बैठना शायद किसी सुखद परिणीती की सूचक हैं । 
बड़ी ही झिझक से गूची जी ने दांत निपोरे एक बड़ा विनम्र सवाल इस नवयौवना की तरफ दागा- " जी, वो आपकी सीट कौन सी है ? " 
तरूणी ने भी बड़ी आत्मीयता के साथ कहा कि " जी फिलहाल तो मेरी सीट कन्फर्म नहीं है, वेटिंग है, आप बहुत सभ्य और सौम्य लगे इसलिए मैं यहां बैठने का साहस कर पाई । आपको अगर तकलीफ़ ना हो तो क्या मैं यहां थोड़ी देर बैठ जाऊं, टीटी के आते ही मैं कुछ एरेजमेंट कर लूंगी । " 
गूची जी ने इस कन्या के मुख से संपादिक वाक्यों में बस इतना ही सूना कि "आप मुझे बहुत सभ्य और सौम्य लगें, बस इतना ही सूना कि गूची जी के मन में इतना बड़ा लड्डू फूटा कि उसके धमाके में गूची जी ने आगे कुछ सूना ही नहीं, बस भाव विभोर होकर मुण्डी डोलाते रह गए ।
क्रमशः,,,

                      " पूस प्रवास " भाग-04
                              ( सफरनामा )
यूं तो स्त्री पुरुष में आकर्षण के कई आयाम हो सकतें हैं परंतु मानव गुण धर्म पर पीएचडी ढोक चुके स्काॅलरस का ऐसा मानना है कि हास्य विनोद में पारंगत पुरुष, स्त्रियों को, और रूपवती स्त्रियां, पुरुषों को स्वाभिक रूप से आकर्षित करते हैं । हमारे गूची जी भी ऐसे ही रूपवती सहयात्री के सहयोग की कामना करते हुए सफ़र को एन्ज्वाय करते चले जा रहे थे परन्तु वार्तालाप शुरू करने में गूची जी सहजता महसूस नहीं कर पा रहे थे । शायद गूची जी कि इसी असहजता को महसूस करते हुए  नवयौवना ने स्वयं ही संवाद शुरू किया और बड़े ही सौम्य लहज़े में पूछा-" आपने बताया नहीं कि आपको कोई तकलीफ़ तो नहीं अगर मैं यहां थोड़ी देर बैठ जाऊं ।"
गूची जी लगभग घिघयाते हुए बोले-" नहीं नहीं मुझे कोई तकलीफ़ नहीं, आप आराम से बैठे ।" 
इतना कहते हुए गूची जी ने एक प्रशन भी साथ साथ चिपका दिया " क्या आप अकेले सफर कर रही हो ।"
अब लड़की ने अपनी मंद मुस्कान के साथ संवाद में मिश्री घोलते हुए कहा- " यस, आई एम टोटली एलोन, बट ईट्स फाईन । " 
गूची ने मानो ऐसी ब्युटीफुल ईग्लिश जीवन में पहली बार देखा था अअ , मेरा मतलब सुना था😜 पर मदहोशी को कंन्ट्रोल करते हुए बोले -" यस, नो ईश्शू , पर आप अकेली क्यूं , वो भी वेटिंग टिकट के साथ, क्या परेशानी नहीं होगी? "
अब तक लड़की गूची जी के वजन को तौल चुकी थी इसलिए तपाक से बोली " जी  आप जैसे सभ्य लोग के होते हुए , उतनी परेशानी नहीं । वैसे भी मैं यहां कलकत्ते से इंजीनियरिंग कर रही हूं, महीने दो महीने में एक बार घर जाती ही रहतीं हूं, हर बार कन्फर्म टिकट तो नहीं मिलता, मुझे आदत है, वैसे भी मात्र छः सात घंटे का ही सफर है । "
शायद लड़की ने एक बार में इतना सब इसलिए कह बताया ताकि गूची जी के तरफ से अब कोई अवांछित प्रशन ना उठे ,,,
क्रमशः,,,
सदानन्द कुमार
सदानन्द कुमार
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